28 अगस्त को भोजली महस्व और शंभू ईशर गवरा पुस्तक का विमोचन
03-Aug-2026
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उनकी अमर कीर्ति और शौर्यगाथाएँ केवल आदिम समाज तक सीमित नहीं, बल्कि लोकगाथाओं के रूप में व्यापक जनमानस में परिलक्षित हैं। उनके स्मरण में प्रतिवर्ष कार्तिक अमावस्या को शंभू ईशर राजा और गवरा दाई का मड़मिंग (विवाह संस्कार) बड़े ही हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न कराया जाता है। यह आयोजन केवल सांस्कृतिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि समाज को संगठित, सुसंस्कारित और सांस्कृतिक रूप से एकजुट करने का माध्यम है।
आदिम मान्यता के अनुसार, इस प्रतीकात्मक विवाह संस्कार पूर्ण होने के पश्चात् ही समाज में बाकी आमजन में विवाह संस्कार प्रारंभ किये जाते हैं। यह परंपरा सामाजिक अनुशासन और सांस्कृतिक मर्यादा की गहन भावना को दर्शाती है।
आज आवश्यकता है कि हम इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को केवल उत्सवों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समझें, संजोएँ और समाज के व्यापक हित एवं मूल दृष्टिकोण के साथ आगे बढायें। इसी शुभकामना के साथ... जय ईशरदेव, जय गवरा दाई, जय सेवा....।